पार्थिव पूजनं – निर्माण

निर्माण

यहां हम केवल निर्माण विधि को समझने का प्रयास कर रहे हैं, इसका यह तात्पर्य ग्रहण नहीं करना चाहिये की सर्वप्रथम पार्थिव का निर्माण ही किया जायेगा। ये चर्चा पूजन प्रकरण में अनावश्यक विस्तार न हो मात्र इस विचार से प्रथम कर रहे हैं।

मृदाहरणसंघट्टप्रतिष्ठाह्वानमेव च ।स्नपनं पूजनं चैव विसर्जनमतः परम् ॥
हरो महेश्वरश्चैव शूलपाणिः पिनाकधृक् ।
पशुपतिः शिवश्चैव महादेव इति स्मृतः ॥

हर, महेश्वर, शूलपाणि, पिनाकधृक्, पशुपति, शिव, महादेव इन नामों से क्रमशः मृदाहरण, संघट्ट (निर्माण), प्रतिष्ठा, आवाहन, स्नपन, पूजन और विसर्जन करे। अर्थात इस विधान के अनुसार भी पार्थिव निर्माण के पश्चात् अन्य पूजन संभव नहीं है, अस्तु कलशस्थापनादि पूर्व ही करे न कि पार्थिव निर्माण करके। एक-एक पार्थिव निर्माण करके तत्काल उनकी स्थापना भी करते चले, ऐसा न कि निर्माण करके और कहीं संग्रह करे, गिराकर रखे।

मन्त्रेणावाहयेद्देवं प्रतिलिङ्ग पिनाकिनः ।ततो लिङ्गस्थितं ध्यायेत्सुप्रसन्नं महेश्वरम् ॥

अर्थात प्रत्येक लिंग में पिनाकी नाम से आवाहन करे अर्थात एक-एक करके निर्माण करे और तत्क्षण स्थापित करके पिनाकी नाम से अक्षत-पुष्पादि लेकर पिनाकी नाम से आवाहन करे और प्रत्येक लिंग में आवाहन करे।

यदि एक बार में निर्माण के लिये लिंग संख्या की बात करें तो वह एक ही पुष्ट है, इसकी चर्चा इसलिये अपेक्षित है कि यदि कोई एक लिंग निर्माण करता है तो उसे अन्य लोग निषेध बताकर दो-दो निर्माण करने के लिये कहते हैं। ऐसा संभव ही नहीं है यदि पार्थिव निर्माण के विधि से किया जाये तो। दो-दो करके पार्थिव निर्माण करना ही शास्त्रानुकूल नहीं है।

हरमन्त्रेण गृह्णीयादक्षमात्राधिका मृदम् ।महेश्वरस्य मन्त्रेण लिङ्गं कुर्यात्तया शुभम् ॥

हर मन्त्र से मृदा ग्रहण करे और अक्ष (रुद्राक्ष या बहेड़ा) के आकार से कुछ अधिक मात्रा में ग्रहण करे तदनन्तर महेश्वर मन्त्र से पुनः शुभ-सुन्दर लिङ्ग का निर्माण करे।

अंगुष्ठमानादधिकं वितस्त्यवधिसुन्दरम् ।पार्थिवं रचयेल्लिङ्गं न न्यूनं नाधिकं च तत् ॥

यदि विधि के अनुसार सावधानी पूर्वक पार्थिव लिंग निर्माण किया जाय तो एक व्यक्ति अधिकतम ११०० ही निर्माण कर सकते हैं किन्तु ५०००/७०००/८००० तक निर्माण करते देखा जाता है। इस प्रकार से पार्थिव निर्माण-पूजन में प्रदर्शन मात्र ही प्रकट होता है क्योंकि प्रामाणिक स्वरूप में कोई भी पार्थिव लिंग नहीं बनता, और यह देखकर ही स्पष्ट हो जाता है।

न्यूनतम ४ अंगुल और अधिकतम द्वादशांगुल होने चाहिये और मोटाई इतनी हो कि प्रत्येक लिंग स्वतंत्र रूप से स्थापित किये जा सकें एवं सुन्दर हों अर्थात यदि श्रद्धा / आस्था हो तो एक-एक पार्थिव लिंग पूरी विधि से बनाये यह आवश्यक है।

किन्तु वर्त्तमान दशक में (२०२१ – २०३०) एक नया शास्त्रविरुद्ध व्यवहार भी प्रचलित हो गया है वो है मुख्य लिंग का बड़ा आकार और उसमें नाक-मुंह आदि बनाना, ये शास्त्रविरुद्ध है और निंदनीय है। आँख-नाक-मुंह-मूंछ आदि का शिवलिंग में कोई निर्देश नहीं है और सुंदर रचना करे का भी ऐसा अर्थ नहीं है एवं यह अनर्थ वर्त्तमान दशक में भी आरम्भ हुआ है। इस अनर्थ से बचें इसमें दोष ही उत्पन्न होगा, मुख्य महादेव (बुढ़वा महादेव) के संबंध में दो महत्वपूर्ण तथ्य है :

  • न्यूनतम ४ अंगुल से अल्प भी न हो और अधिकतम १२ अंगुल से अधिक भी न हो।

  • साथ ही दो भागों में (अर्घा और लिंग) न हो, एक ही भाग में केवल लिंग हो।

रत्नजं हेमजं लिंगं पारदं स्फाटिकं तथा ।पार्थिवं पुष्परागोत्थमखंडं तु प्रकारयेत् ॥

जहां लक्षपूजन की बात हैं वहां ऐसा नियम नहीं कि एक दिन में ही करे और एक दिन में ही करना हो तो भी विधिपूर्वक ही करे। इस संबंध में प्रतिनिधि विचार पृथक किया गया है। किन्तु यहां इतना संकेत आवश्यक है कि जो कोई भी पार्थिव लिंग निर्माण करे वह पूजा भी करे, निर्माण करके त्याग न करे।

लक्षपार्थिवलिङ्गानां पूजनाद् भुवि मुक्तिभाक् ।लक्षं तु गुडलिङ्गानां पूजनात् पार्थवो भवेत् ॥

ध्यातव्य : लक्षपूजन का माहात्म्य है किन्तु विधान का पालन करना भी आवश्यक है।

एक प्रश्न : आपने जीवन में कितनी बार विधिपूर्वक पार्थिव शिवलिंग का निर्माण किया है ? (स्वयं से ही प्रश्न करें और स्वयं ही उत्तर ढूंढें)

अब निर्माण विधि को थोड़ा और अधिक समझने का प्रयास करते हैं, ऊपर मुख्य विषय था एवं नीचे उसके और विस्तार हैं :

लिंग निर्माण “ॐ महेश्वराय नमः” मंत्र से किया जाता है यह मंत्र प्रत्येक लिंग निर्माण में पढ़ें न कि लिंग निर्माण करते समय वार्तालाप-हंसी-मजाक आदि करे।

“ॐ वं” इस मंत्र को पढकर मिट्टी को सिक्त करे, जल मिलाकर भलीभांति अवलोकन पूर्वक कंकड आदि निकाले और मिट्टी को गूंथ ले। गूंथे हुये मिट्टी को शुद्ध पात्रादि (व्यवस्थानुसार) में रखे ।

संकल्प्यैवं मृदः पिण्डादादायाल्पां मृदं सुधीः ।एकादशार्णमन्त्रेण कुर्याद बालगणेश्वरम् ॥

थोड़ी मृदा ग्रहण करके “ॐ ह्रीं ग्लौं गं गणपतये नमः ग्लौं गं ह्रीं” इस एकादशाक्षर मंत्र से बालगणपति का निर्माण करके आसन पर स्थापित करे ।

हरमन्त्रेण गृह्णीयादक्षमात्राधिका मृदम् ।महेश्वरस्य मन्त्रेण लिङ्गं कुर्यात्तया शुभम् ॥

  • मृदा ग्रहण : “ॐ हराय नमः” इस मंत्र से लिंग निर्माण हेतु मिट्टी ले ।

  • लिंग गठन : “ॐ महेश्वराय नमः” कहकर लिंग निर्माण करे ।

शूलपाणेस्तु मन्त्रेण लिङ्गं पीठे निधापयेत ।एवमन्यानि कुर्वीत यथा संकल्पमादरात् ॥

लिंग स्थापन : “ॐ शूलपाणये नमः” मंत्र से ताम्र/कांसा आदि के पात्र/वस्त्र/पीठ (मंडल) आदि जो व्यवस्था हो उसपर स्थापित करें । संकल्पानुसार इसी प्रकार और अर्थात जितनी संख्या संकल्प में उद्धृत किया हो उतना निर्माण करे। यहां पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है कि संकल्प पूर्व ही होगा एवं अन्यत्र यह स्पष्ट है कि पार्थिव निर्माण के पश्चात् अन्य किसी देवता की पूजा भी निषिद्ध है।

अवशिष्टमृदा कुर्यात्कुमारं तस्य मन्त्रतः ।स्थापयेल्लिङ्गपंक्त्यन्ते स्वमन्त्रेणार्चयेच्च तम् ॥

तत्पश्चात शेष मृदा से गणपति, कीर्तिमुख आदि का भी निर्माण करे। “ॐ ऐं हुँ क्षुं क्लीं कुमाराय नमः” मंत्र से षण्मुख (कार्तिक) की प्रतिमा का निर्माण करके स्थापित करे।

इस प्रकार विधि पूर्वक पार्थिव निर्माण करके तदुपरांत पार्थिव पूजन और अंगस्वरूप वर्णित विशेष पूजन ही करे, न कि अन्यान्य पूजन। अन्यान्य सभी पूजन, संकल्प, कलशस्थापन आदि पूर्व ही करे।