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पार्थिव पूजनं – भूमिका
भूमिका कृते रत्नमयं लिंगं त्रेतायां हेमसंभवम् ।द्वापरे पारदं श्रेष्ठं पार्थिवं तु कलौ युगे ॥यथा सर्वेषु देवेषु ज्येष्ठः श्रेष्ठो महेश्वरः ।एवं सर्वेषु लिंगेषु पार्थिवं श्रेष्ठमुच्यते ॥ य: शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारत: ।न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥श्रीमद्भगवद्गीता/१६/२३ हम जो भी शास्त्रोक्त कर्म करें वह यदि शास्त्रीय विधि से करें तभी सार्थक और फलदायक होता…
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पार्थिव पूजनं – माहात्म्य
सूत उवाच शृणुध्वमृषयः सर्वे सद्भक्त्या हरतोऽखिलाः ।शिवपार्थिवलिंगस्य महिमा प्रोच्यते मया ॥उक्तेष्वेतेषु लिंगेषु पार्थिवं लिंगमुत्तमम् ।तस्य पूजनतो विप्रा बहवः सिद्धिमागताः ॥हरिर्ब्रह्मा च ऋषयः सप्रजापतयस्तथा ।संपूज्य पार्थिवं लिंगं प्रापुःसर्वेप्सितं द्विजाः ॥देवासुरमनुष्याश्च गंधर्वोरगराक्षसाः ।अन्येपि बहवस्तं संपूज्य सिद्धिं गताः परम् ॥कृते रत्नमयं लिंगं त्रेतायां हेमसंभवम् ।द्वापरे पारदं श्रेष्ठं पार्थिवं तु कलौ युगे ॥अष्टमूर्तिषु सर्वासु मूर्तिर्वै पार्थिवी वरा ।अनन्यपूजिता विप्रास्तपस्तस्मान्महत्फलम्…
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पार्थिव पूजनं – मंडल
मंडल विषयक चर्चा में एक तथ्य विशेष महत्वपूर्ण है कि यदि ५० – ६० वर्ष के वृद्ध से पूछें तो कहेंगे कि पहले एक भी मंडल नहीं बनता था और यदि नयी पीढ़ी से बात करें तो ज्ञात होगा कि जितने मंडल बनें उतनी विशेष पूजा। पार्थिव पूजन में मंडल विषयक चर्चा बहुत ही महत्वपूर्ण…
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पार्थिव पूजनं – व्यवस्था
यदि हम विधि व्यवस्था कि बात करें तो यह सबसे महत्वपूर्ण भाग है और इस विषय को गंभीरता से समझना आवश्यक है। इस भाग में आने वाले अनेकों विषय को अलग से भी रखा गया है जैसे हवन, मंडल, पार्थिव निर्माण विधि आदि, इसलिये यहां उन विषयों के अतिरिक्त ही समझेंगे और अंत में वैदिकपूजापद्धति…
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पार्थिव पूजनं – हवन
हवन का तात्पर्य विधिपूर्वक स्थापित अग्नि में सावधानी से उत्तम द्रव्यों की आहुति देना होता है न कि अलाव लगाना। प्रायः देखा यही जाता है कि अलाव लगाकर उसमें शाकल्यादि नामक द्रव्य देना मात्र ही हवन समझा जाता है जो की सर्वथा भ्रम है। यदि ठंड में ऐसे अलाव लगायें तो एक लाभ आग सेंकना…
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पार्थिव पूजनं – पार्थिवार्चा
नमः शिवाय मंत्रेणार्चनद्रव्यं च प्रोक्षयेत् ।भूरसीति च मंत्रेण क्षेत्रसिद्धिं प्रकारयेत् ॥आपोऽस्मानिति मंत्रेण जलसंस्कारमाचरेत् ।नमस्ते रुद्र मंत्रेण स्फाटिकाबंधमुच्यते ॥शंभवायेति मंत्रेण क्षेत्रशुद्धिं प्रकारयेत् ।नमः पूर्वेण कुर्यात्पंचामृतस्यापि प्रोक्षणम् ॥नीलग्रीवाय मंत्रेण नमः पूर्वेण भक्तिमान् ।चरेच्छंकरलिंगस्य प्रतिष्ठापनमुत्तमम् ॥भक्तितस्तत एतत्ते रुद्रायेति च मंत्रतः ।आसनं रमणीयं वै दद्याद्वैदिकमार्गकृत् ॥मानो महान्तमिति च मंत्रेणावाहनं चरेत् ।या ते रुद्रेण मंत्रेण संचरेदुपवेशनम् ॥मंत्रेण यामिषुमिति न्यासं कुर्य्याच्छिवस्य…
