संकल्प
गणेशं च दिनेशं च वह्नि विष्णुं शिवं शिवाम् ।
संपूज्य देवषट्कं च सोऽधिकारी च पूजने ॥
गणेशं विघ्ननाशाय आरोग्याय दिवाकरम् ।
वह्निं शौचाय विष्णुं च लक्ष्म्यर्थं पूजयेन्नरः ॥
शिवं ज्ञानाय ज्ञानेशं शिवां च मुक्तिसिद्धये ।
संपूज्यैताँल्लभेत्प्राज्ञो विपरीतमतोऽन्यथा ॥
संकल्प का तात्पर्य केवल संकल्प नहीं है, संकल्प से पूर्व पवित्रीकरणादि सहित है। इसमें एक तथ्य और भी जुड़ जाता है वो यह कि सामान्य जन-जीवन से नित्यकर्म विलुप्तप्राय है अस्तु संक्षित्प रूप से ही सही किन्तु ब्राह्मण ही नित्यकर्म भी संपन्न कराते हैं। नित्यकर्म संकल्प से भी पूर्व होना चाहिये अस्तु सर्वप्रथम पवित्रीकरणादि करके सूर्य नारायण को गायत्री मन्त्र से तीन बार अर्घ्य देकर १० बार गायत्री जप कर ले। तदुपरांत संक्षिप्त रूप से ही सही तर्पण भी आवश्यक होता है। तर्पण के पश्चात् पंचदेवता व विष्णु पूजन करके संकल्प करें।
आगे कुलदेवता आदि का भी नित्य की भांति (विशेष द्रव्यादि सहित) पूजन करके फिर उत्तराभिमुख बैठकर संकल्प करे। त्रिकुशा, तिल, जल, पुष्प, चंदन आदि द्रव्य लेकर संकल्प करे :

विष्णु पूजन :
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तिल-यव : एते यवतिलाः ॐ भूर्भुवः स्व: भगवन् श्रीविष्णो इहागच्छ इह तिष्ठ॥
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जल : एतानि पाद्यार्घाचमनीयस्नानीयानि ॐ भूर्भुवः स्व: भगवते श्री विष्णवे नमःv
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फूल चंदन : इदं सचंदनपुष्पं ॐ भूर्भुवः स्व: भगवते श्री विष्णवे नमः ॥
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तिल-यव : एते यवतिलाः ॐ भूर्भुवः स्व: भगवते श्री विष्णवे नमः ॥
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तुलसी : एतानि तुलसीदलानि ॐ भूर्भुवः स्व: भगवते श्री विष्णवे नमः ॥
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जल : एतानि गंधपुष्पधूपदीपताम्बूल यथाभागनैवेद्यं ॐ भूर्भुवः स्व: भगवते श्री विष्णवे नमः ॥
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जल : आचमनीयं पुनराचमनीयम् ॐ भूर्भुवः स्व: भगवते श्री विष्णवे नमः ॥
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फूल : पुष्पांजलिं ॐ भूर्भुवः स्व: भगवते श्री विष्णवे नमः ॥
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विसर्जन : ॐ भूर्भुवः स्व: भगवन् विष्णो पूजितोसि प्रसीद प्रसन्नो भव क्षमस्व ॥
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पवित्रीकरण मंत्र : ॐ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थाङ्गतोऽपि वा। य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स: बाह्याऽभ्यंतर: शुचि:॥ ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु ॥ विष्णु स्मरण करके (पवित्री धारण करके) शरीर और सभी वस्तुओं को जल से सिक्त करके पवित्र करे।
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आसन पवित्रीकरण मंत्र : ॐ पृथ्वि त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुनाधृता। त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्॥ इस मंत्र से आसन पर जल छिड़क कर आसनशुद्धि करें।
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शिखा बंधन : गायत्री मंत्र से शिखा ग्रंथि करे।
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तिलक : ॐ चन्दनं वन्द्यते नित्यं पवित्रं पापनाशनं। आपदां हरते नित्यं लक्ष्मीर्वसतु सर्वदा ॥
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भस्म धारण : त्र्यायुषं अथवा त्र्यम्बकं मन्त्र से भस्म धारण करे।
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रुद्राक्ष धारण : तदनंतर यदि रुद्राक्ष (माला) धारण न किया हो तो वो भी धारण करे।
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आचमन : ॐ केशवाय नमः॥ ॐ माधवाय नमः॥ ॐ नारायणाय नमः॥ मुख व हस्त मार्जन (२ बार) ॐ हृषिकेशाय नमः॥
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प्राणायाम : फिर तीन बार प्राणायाम करे।
पूजा सामग्रियों (पवित्री (कुशा), जल, पञ्चामृत, चन्दन (घिसा हुआ), पुष्प, बिल्वपत्र, दूर्वा, धूप, दीप, नैवेद्य, पान-सुपाड़ी आदि) की भली भांति व्यवस्था करके ब्राह्मणों का आसन लगाये, स्वयं पूजा स्थान पर आसन लगाकर बैठे। जल के लिये ताम्र पात्र ही उत्तम पक्ष होता है। सर्वप्रथम विष्णु स्मरण करके शरीर शुद्धि, द्रव्य शुद्धि, आसन शुद्धि आदि करे :
पंञ्चदेवता पूजन :
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अक्षत : इदं अक्षतं ॐ सूर्यादि पञ्चदेवता: इहागच्छत इह तिष्ठत ॥
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जल : एतानि पाद्यार्घाचमनीयस्नानीयानि ॐ सूर्यादि पञ्चदेवताभ्यो नम: ॥
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फूल चंदन : इदं सचंदनपुष्पं ॐ सूर्यादि पञ्चदेवताभ्यो नम: ॥
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अक्षत : इदं अक्षतं ॐ सूर्यादि पञ्चदेवताभ्यो नम: ॥
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जल : एतानि गंधपुष्पधूपदीपताम्बूल यथाभागनैवेद्यं ॐ सूर्यादि पञ्चदेवताभ्यो नम: ॥
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जल : आचमनीयं पुनराचमनीयम् ॐ सूर्यादि पञ्चदेवताभ्यो नम: ॥
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फूल : पुष्पांजलिं ॐ सूर्यादि पञ्चदेवताभ्यो नम: ॥
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विसर्जन : ॐ सूर्यादि पञ्चदेवता: पूजितास्थ प्रसीदत प्रसन्ना: भवत क्षमध्वं ॥
खड़ा होकर भगवान सूर्य को (जहां से दिखें) गायत्री मंत्र से तीन बार अर्घ्य देकर नमस्कार करे। गायत्री का आवाहन करके १० बार गायत्री मन्त्र जप कर गायत्री का विसर्जन कर दे। फिर संक्षिप्त रूपेण तर्पण करे (जीवितपितृक पितृ तर्पण न करे)
आगे पूजा स्थान पर बैठकर पुनः आचमन करके पंचदेवता व विष्णु की पूजा करे :
आचार्य वरण (आचार्य विद्वान ब्राह्मण को ही बनाना चाहिये) : ॐ अद्यैतस्य संकल्पित ……… संख्यया पार्थिवपूजन कर्मणि आचार्य कर्म कर्तुं एभिः वरणीय द्रव्यैः ……… गोत्रं …….. शर्माणं ब्राह्मणं आचार्यत्वेन त्वामहं वृणे॥ आचार्य कहें – वृत्तोस्मि। यजमान पुनः कहे यथाविहितं कर्म कुरु। आचार्य पुनः कहें – कर्वाणि। इसी प्रकार अन्य पार्थिवनिर्माण-पूजन करने वाले ब्राह्मणों का भी (आचार्य ऊहपूर्वक) वरण करें :
ॐ अद्यैतस्य संकल्पित ……… संख्यया पार्थिवपूजन कर्मणि ……… संख्यया पार्थिवलिंग निर्माण-पूजन कर्तुं एभिः वरणीय द्रव्यैः ……… गोत्रं …….. शर्माणं ब्राह्मणं पार्थिवपूजनत्वेन त्वामहं वृणे॥ ब्राह्मण कहें – वृत्तोस्मि। यजमान पुनः कहे यथाविहितं कर्म कुरु। ब्राह्मण पुनः कहें – कर्वाणि। इसी प्रकार अन्यान्य ब्राह्मणों का भी वरण करें अथवा तंत्र से ही वरण करें।
संकल्प : ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरूषस्य, विष्णोराज्ञया प्रवर्त्तमानस्य अद्यैतस्य ब्रह्मणोऽह्निद्वितीयपरार्द्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे भारतवर्षे भरतखण्डे जम्बूद्वीपे आर्यावर्तैक देशान्तर्गते ……… १ संवत्सरे महांमागल्यप्रद मासोतमे मासे ……. २ मासे ……… ३ पक्षे ……… ४ तिथौ ………५ वासरे ……… ६ गोत्रोत्पन्नः ……… ७ शर्माऽहं (वर्माऽहं/गुप्तोऽहं) ममात्मनः श्रुति स्मृति पुराणतन्त्रोक्त फलप्राप्तये ग्रहदोष, दैहिक, दैविक, भौतिक – त्रिविध ताप निवार्णार्थं सर्वारिष्ट निरसनपूर्वक सर्वपापक्षयार्थं मनसेप्सित फलप्राप्तिपूर्वक, दीर्घायु शरीरारोग्य कामनया धन-धान्य-बल-पुष्टि-कीर्ति-यश लाभार्थं, सकल आधि, व्याधि, दोष परिहार्थं सकल मनोरथ सिध्यर्थं श्रीभवानीशंकरप्रसन्नार्थं कलशस्थापनपूजनं ततः नवग्रह-दशदिक्पालादिपूजनपूर्वकं …………… शतं/सहस्रं संख्यया पार्थिवलिङ्गानि स्वयं ब्राह्मणद्वारा वा पूजयिष्ये ॥
(१ संवत्सर का नाम, २ महीने का नाम, ३ पक्ष का नाम, ४ तिथि का नाम, ५ दिन का नाम, ६ अपने गोत्र का नाम, ७ ब्राह्मण शर्माऽहं, क्षत्रिय वर्माऽहं, वैश्य गुप्तोऽहं और शूद्र दासोऽहं कहें।)
ध्यातव्य : पार्थिव पूजन में सबका अधिकार है किन्तु वैदिक विधि प्रणवादि में नहीं अस्तु स्त्री-शूद्र-कुमारादि प्रणव व वेदमंत्रों का उच्चारण न करे। प्रणव के स्थान पर औं, ह्रीं, नमः आदि का प्रयोग करना चाहिये एवं वेदमंत्रों के स्थान पर पौराणिक मंत्रों का।
ब्राह्मण पूजन : तदन्तर ब्राह्मण पूजन करे – चन्दन, पुष्प, माला, अक्षत, फल, द्रव्य आदि अर्पित करके।
