श्रेणी: सामग्री

पवित्रता

वर्त्तमान युग में पवित्रता का अर्थ स्वच्छता मात्र समझना सामान्य बात हो गई है और यह मतिभ्रम के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। इसी प्रकार भ्रमित लोगों की बुद्धि के अनुसार हवन करने से वायुमंडल की शुद्धि होती है, यदि वायुमंडल को ही शुद्ध करना है तो मन्त्र और विधान की आवश्यकता कहां है फिर ? अर्थात इस प्रकार के भ्रामक तथ्य बड़े स्तरों पर प्रचारित किये जाते हैं और धार्मिक विषयों में वही लोग जो स्वयं भ्रमित हैं इस प्रकार के कुतर्क करके जो शास्त्रीय विधि से कर्मकांड करने वाले उन्हीं को पाठ पढ़ाया करते हैं। कर्मकांड और धर्म में किसी विषय की सिद्धि के लिये वैज्ञानिक आधार की आवश्यकता ही नहीं है, ये विज्ञान (वर्त्तमान साइंस) से परे है और स्वयं विज्ञान ही आधार प्राप्त करता है।

पवित्रता के लिये यह आवश्यक होता है कि हमारा द्रव्य (धन), अन्न, गृह, वस्त्र, पात्र, देश (स्थान), सामग्री (प्रयुक्त होने वाले द्रव्य) आदि सभी पवित्र हों न कि केवल शरीर स्वच्छ हो। शास्त्रीय विधान का पालन करने से ही मन भी स्वच्छ होता है, न कि केवल कहने से। आज ढेरों कहने वाले हैं आन्तरिक शुद्धि किन्तु एक ओर आतंरिक शुद्धि की बात करते हैं और दूसरी ओर शास्त्रीय सिद्धांतों का खंडन करते रहते हैं।

बाह्याभ्यन्तर शुद्धि में शारीरिक और मानसिक दोनों शुद्धि की बात है और तर्क पर आधारित शुद्धि का महत्व नहीं है, शास्त्रीय विधान से शुद्धि करे यह आवश्यक है। तर्क पर आधारित शुद्धि में संसर्ग आदि दोषों को अस्वीकार किया जाता है जबकि शास्त्रीय शुद्धि में संसर्गादि भी विचार किया जाता है। शारीरिक शुद्धि खंड में प्रमुख तथ्य इस प्रकार समझे जा सकते हैं :

  • जप-पूजा करते समय जो छींक आदि से अशुद्धि उत्पन्न हो उसके लिये आचमन करे।
  • यदि शयन किया हो तो स्नान अनिवार्य होता है।
  • मल-मूत्रोत्सर्ग के पश्चात् भी आवश्यक शुद्धि का पालन करना चाहिये।
  • किसी कारण से यदि धारण किया हुआ वस्त्र खोला गया हो तो पुनः अन्य स्वच्छ वस्त्र ही धारण करे।
  • आमंत्रित करने वाले लोगों की सूचि ध्यान से बनाये कि कोई असंसर्गी न हो। आजकल इसका पूर्णतः त्याग किया जाने लगा है।

देश (स्थान) की शुद्धता के लिये मंडल का विधान है। प्रत्येक कर्म भूमि पर ही करने का विधान है और भूमि को गोमय व पंचगव्य से उपलेपन करके मंडल निर्माण करे यह शास्त्रज्ञा है। वर्त्तमान युग में सभी पक्की करा रहे हैं, मार्बल, टाइल्स लगा रहे हैं और घर में किंचित भूमि को भी कर्मकांड के लिये रिक्त नहीं रहने देते। प्रथम गलती करके फिर विकल्प मांगना ये उचित नहीं हैं।

मंडल एक अनिवार्य क्रिया है और मंडल किये बिना देश (स्थान) की शुद्धि नहीं होती। श्वानादि जब घर में ही रखे हों तो वहां पवित्रता का विचार करना ही व्यर्थ है। श्वान के दृष्टि मात्र से भी अपवित्रता उत्पन्न होती है, स्पर्श की तो बात ही क्या करें।

सामग्री शुद्धि में जो सामग्री प्रयुक्त करने वाले हैं यथा जल, मिट्टी, पत्र-पुष्प, दुग्ध, दही, घृतादि सबकी शुद्धि के भिन्न-भिन्न नियम हैं। जैसे जलाहरण में पादुका का निषेध है, असंसर्गी के संसर्ग का निषेध है एवं मृदाहरण में भी यह नियम है।

अब गंगाजल ही कोई लाये और जूते-चप्पल पहनकर लाये तो वो आचमन के योग्य भी नहीं रहता। यदि दुग्धादि की बात करें तो सर्वोत्तम पक्ष यह है कि स्वयं ही गोपालन करें, द्वितीय पक्ष यह है कि अन्यत्र से शुद्धता को ज्ञात करके प्राप्त करें। जैसे मृतवत्सा न हो, संधिनी न हो, स्तन न्यूनाधिक न हो आदि।

यदि इन नियमों को समझें तो बाजारू दुग्धादि निषिद्ध हो जाते हैं, फिर डेयरी का दूध-दही का प्रयोग करने योग्य नहीं होता। यदि पत्र-पुष्प-समिधा आदि की बात करें तो इसका क्रय नहीं होना चाहिए मूल्य प्रयोग होने से भी दोष उत्पन्न होता है किन्तु आज सभी पत्र-पुष्प-समिधा आदि भी क्रय करते हैं।

यदि पूजन के विशेष सामग्री सप्तमृत्तिका, सर्वौषधि, पंचरत्न, इत्र, गुलाबजल आदि की बात करें तो वो सभी (जो बाजार से क्रय किया जाता है) पूजा काल में में स्पर्श करने योग्य भी नहीं होते प्रयोग करना तो चिंताजनक है। तेल-घृत में इतना दोष नहीं होता किन्तु शुद्ध हो इसका विचार तो उसमें भी करना ही पड़ता है और ये प्रयोग करने वाले का ही दायित्व होता है न कि बेचने वाले का। विक्रेता अपने स्थान पर दोषी है किन्तु क्रेता अपना दोष विक्रेता के ऊपर नहीं डाल सकता।

चंदन के नाम पर केवल कुमकुम का प्रयोग करना शास्त्र और कर्मकांड में अनास्था है। चन्दन का तात्पर्य पत्थर पर चन्दन की लकड़ी घिसकर प्राप्त किया हुआ चन्दन है और यही विधान है एवं और भी विधान है जैसे अधिक पतला न हो (अर्थात जल अधिक न मिलाये), ताम्रपात्र में न रखे आदि। चन्दन के नाम पर कुमकुम प्रयोग करना अश्रद्धा-अनास्था का परिचायक होता है। इसी प्रकार धूप के स्थान पर अगरबत्ती का प्रयोग करना भी समझना चाहिये। इस प्रकार से शुद्धि विधान का विकास के नाम पर परित्याग करना अश्रद्धा-अनास्था है या मतिभ्रम है।

नैवेद्य खंड में तो विशेष विचार की आवश्यकता होती है, नैवेद्य में पायस, पक्वान्नादि की विशेष आवश्यकता होती है और जो भी भोग लगाये जायें वो सभी मिष्टान्नादि भी स्वयं ही शुद्ध सामग्रियों से पवित्रता पूर्वक निर्माण करें यह आवश्यक नियम है। बाजारू मिष्टान्न की बात करें तो एक मात्र बतासा ग्राह्य होता है। लड्डू, पेड़ा आदि जो भी अर्पित करना हो वो स्वयं ही बनाने का विधान है, न कि क्रय करने का। यदि स्वयं न बना सके तो अन्य का सहयोग लिया जा सकता है अथवा अत्यधिक बनाना हो तो हलवाई को भी रखा जा सकता है किन्तु उसे भी पवित्रतापूर्वक निर्माण करना अनिवार्य होता है और ऐसा नियम पहले ही विदित करे।

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