विशेष सामग्री
दत्त्वा तु विजया पत्रं अश्वमेधफलं भवेत् ॥
बहुत लोगों को भांग के विषय में प्रश्न करते देखा जा सकता है कि कहां लिखा है ? इस प्रश्न के उत्तर में ऊपर प्रमाण प्रस्तुत किया गया है।
पूजा में मुख्य भाव ही होता है सामग्रियां गौण होती हैं, किन्तु भाव होने पर सामर्थ्यानुसार आवश्यक सामग्रियों का भी प्रबंध किया जाता है भले ही वो सबरी के बैर ही क्यों न हों, सुदामा के तण्डुल ही क्यों न हो। भाव पूर्वक सामर्थ्यानुसार उपलब्ध एक सामग्री भी भगवान भाव से ही ग्रहण कर लेते हैं किन्तु अहंकार पूर्वक, प्रदर्शन करने वालों आदि के सर्वस्व समर्पण को भी स्वीकार न करें।
इसलिये पूजा करनी तो चाहिये भाव से ही किन्तु पूजा में अर्पित होने वाली सामग्रियां भी सामर्थ्यानुसार उपलब्ध करने का प्रयास करना चाहिये। जब भाव की प्रबलता होती है तो जो सामग्रियां सबके लिये उपलब्ध न हो वो भी सहजता से उपलब्ध हो जाती है। पार्थिव (शिव) पूजन की विशेष सामग्रियों को इस प्रकार समझा जा सकता है :
जल : गंगाजल हो अथवा अन्य नदियों का उपलब्ध जल किन्तु आहरण की विशेष विधि होती है और उस विधि से ही पूजा के लिये आहरण करें। जूते-चप्पल पहनकर या अन्य प्रकार से पवित्रता का परित्याग करके जल का आहरण भी न करें। किसी अन्य व्यक्ति से यदि मंगवायें तो यह ज्ञात करके कि उसका लाया जल ग्राह्य होगा अथवा नहीं।
बेलपत्र : शिवपूजन में बेलपत्र की विशेष आवश्यकता होती है किन्तु बेलपत्र तोड़ने का भी विधान है। पूजा के दिन डालियां तोड़कर लाना और फिर बेलपत्र तोड़ना अनुचित है। बेलपत्र १० दिनों तक पर्युषित नहीं होता अस्तु पूजा से ९ दिन पूर्व भी जब अनुकूल हो बेलपत्र की व्यवस्था कर सकते हैं। न्यूनतम एक दिन पूर्व तो अवश्य ही कर लें क्योंकि पूजा के दिन अन्यान्य ढेरों कार्य होते हैं। नित्य पूजा में प्रतिदिन ग्रहण किया जा सकता है क्योंकि वहां आवश्यकता ही अल्प होती है विशेष पूजा में आवश्यकता भी विशेष होती है।
दुग्धादि : दुग्धादि के विषय में यह तो स्पष्ट ही है कि गाय का हो किन्तु उसमें भी ऐसा नहीं कि किसी भी गाय का हो। ग्राह्य दुग्धादि के लिये गाय के विषय में भी नियम है कि वह संधिनी न हो, सवत्सा हो, स्तन में न्यूनाधिक्यता न हो, स्वस्थ हो आदि। दुकानों का दुग्ध, दही, घृत पूजा के लिये ग्राह्य नहीं होता।
अभिषेक द्रव्य : अभिषेक द्रव्य के विषय में प्रायः ऐसा देखने को मिलता है कि अनेकानेक द्रव्यों से अभिषेक किया जाता है। यह किसी भी प्रकार से उचित प्रतीत नहीं होता। एक बार में किसी एक ही द्रव्य से अभिषेक करना उचित है चाहे वो जल ही क्यों न हो। यदि अनेकानेक द्रव्यों से अभिषेक करना हो तो सभी द्रव्यों से पूर्णाभिषेक होना चाहिये न कि एक ही अभिषेक में सभी द्रव्यों का प्रयोग। जैसे पंचामृत के विभिन्न द्रव्यों से स्नान कराने में देखने को मिलता है और जब ऐसा करेंगे तो एक दिन में अनेक द्रव्यों से अभिषेक संभव नहीं होगा। इस प्रकार मान लें की पांच द्रव्यों से अभिषेक करना हो तो पांच दिनों का अनुष्ठान करके करना चाहिये।
सुगन्धित द्रव्यादि : वर्त्तमान में प्रदर्शन मात्र की ही सोच देखने को मिलती है और सामग्री की अधिकता को महत्व दिया जाता है, शुद्धता को नहीं। इत्र, गुलाब जल आदि में शुद्धता तभी संभव है जब वह स्वयं निर्माण करें। दुकानों से लिया गया सुगन्धित द्रव्य पूजा में अर्पित करने योग्य नहीं होता। तेल ग्राह्य होता है किन्तु जो तेल मिलता है वो स्वयं ही दूषित है, तिल-तेल तक जो कि पूजा के लिये मिलता है अपद्रव्य मिश्रित (दूषित/अग्राह्य) होता है अन्य तेलों की तो बात ही क्या करें। अर्थात पूजा के लिये शुद्ध तिल तेल भी चाहिये तो उसकी व्यवस्था स्वयं ही करनी होगी। इसी प्रकार भस्म के स्थान पर शुद्ध मिट्टी चढ़ाना उत्तम पक्ष है किन्तु दुकानों में बिकने वाला भस्म उत्तम नहीं। ये तब है जब स्वयं भस्म निर्माण न किये हों, यदि कर लें तो विकल्प की आवश्यकता ही नहीं होगी।
विशेष ध्यातव्य : बाजार में मिलने वाली प्रत्येक सामग्री यदि उसका निर्माण किए गया हो तो अग्राह्य ही हो जाता है क्योंकि उसको पूजा आदि में प्रयोग के दृष्टिकोण से नहीं बनाया जाता। और जो पूजा के लिये ही विशेष रूप से बनाया जाता है वो तो और भी दूषित होता है।